सोमवार, 24 अगस्त 2009

धरती कह रही है : तुम मुझे बचाओ, मैं तुम्हें बचाऊँ

सम्माननीय पाठक वृन्द,


पत्रिका गुंजन के प्रवेशांक की एक और प्रविष्टी आपके के समक्ष प्रस्तुत करते हुये बड़ा हर्ष हो रहा है। आशा है कि आप अपने अमूल्य विचारों और प्रतिक्रियाओं से हमें और बेहतर करने की प्रेरणा देते रहेंगे।

प्रस्तुत आलेख के लेखक श्री सुभाष रानाड़े है जो कि इन्दौर(म।प्र।) से प्रकाशित सांध्य दैनिक के संपादक हैं।


सविनय,


जीतेन्द्र चौहान मुकेश कुमार तिवारी

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धरती कह रही है : तुम मुझे बचाओ, मैं तुम्हें बचाऊँ
श्री सुभाष रानाडे




लगभग साढ़े चार अरब वर्ष पहले धरती अस्तित्व में आई थी। तब से आज तक इसमें न जाने कितने आंधियाँ आई, ज्वालामुखी विस्फोट हुए और भूकंप आए। प्रकृति के कोप से निपटने के लिये धरती माता ने खुद को बहुत मजबूती से थामे रखा, ताकि हम उसकी गोद में आराम से अपना जीवन बिता सकें। मगर अब धरती माँ अपनी ही संतान यानी मानव की करतूतों से हैरान-परेशान है। वह समझ नहीं पा रही है कि मानव के अत्याचार का सामना किस प्रकार करें। प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की ललक के चलते मनुष्य न सिर्फ धरती को तबाह कर रहा है, बल्कि खुद ही अपनी बर्बादी का रास्ता भी तैयार कर रहा है। नतीजा ग्लोबल वार्मिंग के खतरे के रूप में सामने आ रहा है।
धरती के तापमान में औसतन वृद्धि को ही ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं। चूँकि धरती का तापमान बढ़ रहा है, इसलिए वर्षा भी अपने समय के मुताबिक नहीं होती, बल्कि समुद्र का जलस्तर भी निरंतर बढ़ रहा है। यही वजह है कि वनस्पति व जीव-जगत के ऊपर कई प्रकार के खतरे मँडराने लगे हैं। मौसम विज्ञानियों की राय है है कि ग्रीन हाऊस इफेक्ट और ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौसम में लगातार बदलाव हो रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को यदि गंभीरता से नहीं लिया गया तो सामाजिक-आर्थिक मामलों में लगातार प्रगति कर रहा हमारा एशिया दशकों पीछे चल रहा है।
वैसे ग्लोबल वार्मिंग के चलते न केवल ग्लेशियर पिघल रहे हैं, बल्कि समुद्र का जलस्तर भी बढ़ता जा रहा है। कभी सुनामी , तो कभी अतिवर्षा या अवर्षा के कारण खेती और फसलों की पैदावार प्रभावित हो रही है। अब सवाल यह है कि अगर अनाज पैदा नहीं हुआ तो हम खाएंगे क्या ? और अगर खाएंगे ही नहीं तो जियेंगे कैसे ? यानी ग्लोबल वार्मिंग का सवाल हमारे जीवन मरण से जुड़ा हुआ है।
हम अपनी राजमर्रा की जिंदगी में कुछ बातें ध्यान में रखें तो च वार्मिंग की समस्या से मुकाबला कर सकते हैं। जैसे-
1. लट्टू(रेग्यूलर बल्ब) की जगह फ्ल्यूरोसेंट बल्ब(सी.एफ.एल.) का इस्तेमाल।
2. ईंधन और ऊर्जा की बचत ।
3. ऐसी चीजों का इस्तेमाल कम करना जिससे पर्यावरण प्रदूषित होता है मसलन प्लास्टिक की थैलियाँ और अन्य सामान जिनका कि जैव-रासायनिक अपघटन (बॉयोकेमिक डीकॉम्पोजिशन) नही हो पाता हो।
4. पौधारोपण कर घर के आसपास के वातावरण को हरा-भरा रखना ।
5. बिजली, कोयला आदि की बजाय ऊर्जा के गैर पारंपरिक स्त्रोतों का इस्तेमाल जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा आदि।
6. पेट्रोल के इस्तेमाल पर नियंत्रण कर इथेनाल और बायो फ्यूल को बढ़ावा देना।
धरती की आस अभी भी बाकी है। उसे विश्वास है कि उसकी संताने अपनी गलतियों को सुधारेगीं। मनुष्यों को तरह तरह के संकेतों (जैसे पोलर आइस कैप का पिघलना, सुनामी, ग्लोबल वार्मिंग) के माध्यम से समझा रही कि अगर तुम्हें अपना अस्तित्व बचाना है तो मेरे अस्तित्व का ध्यान रखना होगा। यानी कि अगर उनका फार्मूला बहुत स्पष्ट है- तुम मुझे बचाओ, मैं तुम्हें बचाऊँ और अगर ऐसा नहीं हो पाया तो ? फिर तो वह दिन दूर नहीं जब संसार में भयंकर तबाही होगी।
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202, सुंदरम, 134, धनवंतरि नगर
इन्दौर 452 012
सुभाष जी 6 पीएम (सांध्य दैनिक, इन्दौर) के संपादक हैं।

4 टिप्‍पणियां:

एकलव्य ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रेरक . सभी को प्रेरणा ग्रहण करना चाहिए .

एकलव्य ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रेरक . सभी को प्रेरणा ग्रहण करना चाहिए .

भूतनाथ ने कहा…

गूंजने लगी है आपकी गूंजन.....और यह आलेख तो वाकई अच्छा बन पडा है.....आपकी गूंजन के प्रति शुभकामनाओं के संग....आपका भूतनाथ.....!!

काव्या शुक्ला ने कहा…

Sach kaha Aapne.
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को प्रगति पथ पर ले जाएं।